|| Hare Krishna, Hare Krishna, Krishna Krishna, Hare Hare, Hare Rama, Hare Rama, Rama Rama, Hare Hare ||

Hare Krishna Mandir

Serving the mission of HDG Srila Prabhupada

Six Infallible Promises by Krishna

Six Infallible Promises by Krishna
By Virupaksha Dasa

Scroll down to read in English
भगवान् कृष्ण के 6 अमोघ वचन भगवद्गीता में भगवान् कृष्ण की शिक्षाएँ ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र के मायनों से भी परे जाकर, एक स्नेहि परम पिता के अपने पुत्रों के प्रति प्रेममय भावनाएँ उजागर करती हैं। गीता में भगवान् कृष्ण एक पिता के रूप में वचन देते हैं कि वे शरणागत पुत्रों का कभी परित्याग नहीं करेंगे और स्वयं उनका उद्धार करेंगे। और साथ ही वे हमें उपदेश देते हैं कि हम कभी उनका हाथ न छोड़ें।

1. “आवश्यकताएँ पूरी करता हूँ” (9.22)

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्‌ ॥

किन्तु जो लोग अनन्यभाव से मेरे दिव्यस्वरूप का ध्यान करते हुए निरन्तर मेरी पूजा करते हैं, उनकी जो आवश्यकताएँ होती हैं, उन्हें मैं पूरा करता हूँ और जो कुछ उनके पास है, उसकी रक्षा करता हूँ ।

2. “सारे अवरोधों को लाँघ जाओगे” (18.58)

मच्चित्तःसर्वदुर्गाणिमत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथचेत्वमहङ्‍कारान्नश्रोष्यसिविनङ्क्ष्यसि॥

यदि तुम मुझसे भावनाभावित होगे, तो मेरी कृपा से तुम बद्ध जीवन के सारे अवरोधों को लाँघ जाओगे । लेकिन यदि तुम मिथ्या अहंकारवश ऐसी चेतना में कर्म नहीं करोगे और मेरी बात नहीं सुनोगे, तो तुम विनष्ट हो जाओगे ।

3. “भक्त का कभी विनाश नहीं होता”(9.31)

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥

वह तुरन्त धर्मात्मा बन जाता है और स्थायी शान्ति को प्राप्त होता है । हे कुन्तीपुत्र ! निडर होकर घोषणा कर दो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता है ।

4. “संसारसागर से शीघ्र उद्धार” (12.6-7)

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्‌ ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्‌ ॥

जो अपने सारे कार्यो को मुझमें अर्पित करके तथा अविचलित भाव से मेरी भक्ति करते हुए मेरी पूजा करते हैं और अपने चीतों को मुझ पर स्थिर करके निरन्तर मेरा ध्यान करते हैं, उनके लिए हे पार्थ ! मैं जन्म-मृत्यु के सागर से शीघ्र उद्धार करने वाला हूँ ।

5. “निश्र्चित रूप से मेरे पास आओगे” (18.65)

मन्मनाभवमद्भक्तोमद्याजीमांनमस्कुरु।
मामेवैष्यसिसत्यंतेप्रतिजानेप्रियोऽसिमे॥

सदैव मेरा चिन्तन करो, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे नमस्कार करो । इस प्रकार तुम निश्र्चित रूप से मेरे पास आओगे । मैं तुम्हें वचन देता हूँ, क्योंकि तुम मेरे परम प्रिय मित्र हो ।

6. “समस्त पापों से उद्धार” (18.66)

सर्वधर्मान्परित्यज्यमामेकंशरणंव्रज।
अहंत्वासर्वपापेभ्योमोक्षयिष्यामिमाशुचः॥

समस्त प्रकार के धर्मो का परित्याग करो और मेरी शरण में आओ । मैं समस्त पापों से तुम्हारा उद्धार कर दुँगा । डरो मत ।

 

 

 

6 infallible promises by Krishna

The teachings of Lord Krishna in Bhagavad-gita go beyond the scope of brahma-vidya and yoga-shastra and reveal the intense feelings of an affectionate father towards His sons. Lord Krishna as the Supreme father, promises that He will never forsake His surrendered children and will personally take care of them. And at the same time He instructs that the children should never leave His hand.

1. “Carry what you lack” (9.22)

ananyascintayanto mam
yejanahparyupasate
teshamnityabhiyuktanam
yoga-kshemamvahamyaham

But those who worship Me with devotion, meditating on My transcendental form-to them I carry what they lack and preserve what they have.

2. “Pass over all obstacles” (18.58)

mac-cittahsarva-durgani
mat-prasadattarishyasi
athacettvamahankaran
nashroshyasivinankshyasi

If you become conscious of Me, you will pass over all the obstacles of conditional life by My grace. If, however, you do not work in such consciousness but act through false ego, not hearing Me, you will be lost.

3. “Devotee will never perish” (9.31)

kshiprambhavatidharmatma
shashvac-chantimnigacchati
kaunteyapratijanihi
na me bhaktahpranashyati

He quickly becomes righteous and attains lasting peace. O son of Kunti, declare it boldly that My devotee never perishes.

4. “Swift deliverer from material ocean” (12.6-7)

yetusarvanikarmani
mayisannyasya mat-parah
ananyenaivayogena
mamdhyayantaupasate

teshamahamsamuddharta
mrityu-samsara-sagarat
bhavaminaciratpartha
mayyaveshita-cetasam

For one who worships Me, giving up all his activities unto Me and being devoted to Me without deviation, engaged in devotional service and always meditating upon Me, who has fixed his mind upon Me, O son of Prtha, for him I am the swift deliverer from the ocean of birth and death.

5. “Come to Me without fail” (18.65)

man-mana bhava mad-bhakto
mad-yaji mamnamaskuru
mamevaishyasisatyamte
pratijanepriyo 'si me

Always think of Me and become My devotee. Worship Me and offer your homage unto Me. Thus you will come to Me without fail. I promise you this because you are My very dear friend.

6. “Freedom from all sins” (18.66)

sarva-dharmanparityajya
mamekamsharanamvraja
ahamtvamsarva-papebhyo
mokshayishyami ma shucah

Abandon all varieties of religion and just surrender unto Me. I shall deliver you from all sinful reaction. Do not fear.

 

Category : Bhagavad-gita
Posted On : 12 Dec 2018
Virupaksha Dasa

Virupaksha Dasa joined as a full time missionary in 2005 and is serving at Hare Krishna Movement Ahmedabad. He serves as a Bhagavad-gita teacher and Executive Editor for HKM's Hare Krishna Darshan Magazine.