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The Birth and Glory of Hanuman

The Birth and Glory of Hanuman
By Admin

सुमेरु पर्वत पर केसरी नाम का शक्तिशाली वानरराज अपनी सुन्दर पत्नी अंजना के साथ रहता था । एक बार वायुदेव ने अंजना को वन में अकेले देखकर उससे सम्बन्ध बनाना चाहा और उनकी योगिक शक्ति से अंजना ने हनुमान नामक पुत्र प्राप्त किया ।

जन्म के उपरांत हनुमान भूख के कारण रोने लगे, तब अंजना उन्हें घांस में रखकर वन में फल खोजने चली गई । हनुमान वहाँ से सूर्य को देखकर एक बड़ा फल मान बैठे और उसे खाने के लिए आकाश में लपक गए । वायुदेव ने ठंडी हवा से उनकी रक्षा की ताकि सूर्य की उष्णा से बालक को हानि न हो । सूर्यदेव ने एक विष्णुभक्त को आते हुए देखा तो अपना तेज कम कर दिया ।

वह सूर्यग्रहण का दिन था जब हनुमान सूर्य की ओर अग्रसर हो रहे थे, और राहू सूर्य को खाने के लिए पहुँचा । हनुमान ने उसे धक्का देकर भगा दिया । घबराया हुआ राहू इन्द्रदेव के पास पहुंचा और कहा कि सूर्य को खाने के लिए एक और राहू आया है । इंद्र तीव्रता से हनुमान की ओर बढ़े तो हुनमान ने इंद्र को दूसरा फल समझकर उसे खाने की चेष्टा की और उसकी तरफ बढ़े। इंद्र ने वज्र से प्रहार किया जिससे हनुमान मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े । यह देखकर वायुदेव क्रोधित हुए और सभी प्राणियों की प्राणवायु खींच ली जिससे सभी प्राणियों का दम घुटने लगा ।

इंद्र तथा देवताओं ने वायुदेव से प्राणवायु वापस लौटाने की याचना की । ब्रह्माजी भी वहाँ प्रकट हुए और वायुदेव ने समझाया कि इंद्र के वज्र-प्रहार से उनका पुत्र अचेत हो गया  है, इसलिये उन्होंने ब्रह्माण्ड की प्राणवायु खींच ली है ।

ब्रह्माजी ने अपने स्पर्श से हनुमान को पुनः सचेत किया और देवताओं से कहा, “यह वानर पृथ्वी पर हमारा उद्देश्य पूर्ण करेगा और भगवान् विष्णु का प्रसिद्द सेवक बनेगा । आप सभी इसे आशीर्वाद दीजिये ।"

इंद्र ने अपना हार निकालकर हनुमान के गले में डाला और बोले, “आज से मेरा वज्र कभी इसे क्षती नहीं पंहुचा सकेगा ।“

सूर्यदेव ने अपने तेज के एक सौंवा हिस्सा वरदान में दिया तथा शास्त्रिक ज्ञान में सर्वोच्च होने का आशीर्वाद भी ।

यमराज ने अपने यम-दंड के प्रकोप से एवं  बिमारियों से मुक्ति का वरदान दिया । कुबेर ने आशीर्वाद दिया कि हनुमान कभी भी युद्ध में नहीं थकेंगे । शिवजी ने वरदान दिया कि उनके अस्त्रों से हनुमान को कभी हानि नहीं होगी और न उनके हाथों से कभी मृत्यु होगी । विश्वकर्मा बोले कि हनुमान कभी उनके बनाये हुए अस्त्रों से घात नहीं होंगे और चिरंजीवी रहेंगे ।

अंत में ब्रह्माजी बोले, “हे वायुदेव, तुम्हारा पुत्र युद्ध में अजेय होगा । अपने शत्रुओं के लिए आतंक साबित होगा और मित्रों के लिए आश्रय । वह अपनी इच्छा से रूप बदल सकेगा और जहाँ चाहे वहाँ मनचाही गति से जा सकेगा । किसी ब्राह्मण का श्राप इसे नहीं मार सकता । युद्ध में यह महान उपलब्धियाँ प्राप्त करेगा और इस प्रकार यह रावण के विनाश और राम के आनंद का कारण बनेगा ।

इसके बाद देवताओं ने प्रस्थान किया और वायुदेव हनुमान को उनकी माता के पास ले गए ।

(रामायण में अगस्त्य ऋषि द्वारा भगवान् राम को बताई गई गाथा)

On Mount Sumeru lived a powerful Vanara leader, Keshari with his beautiful wife Anjana. Once Vayudev saw her alone in the forest and desired to unite with her. By his mystical yoga she gave birth to a child named Hanuman. Once when Hanuman cried in hunger, Anjana placed him in grass and went to collect fruits.

Hanuman saw the sun and thinking it to be a large fruit, he flew upwards to grab it. Vayu went with him, covering him with a cool breeze so that he would not be burned by the sun. The sun-god also withheld his blazing rays as he understood that Hanuman was a great devotee of Vishnu.

As Hanuman flew towards the sun, Rahu approached to swallow the sun as it was the day of eclipse. But Hanuman pushed him aside. Fearful Rahu went to Indra and informed that another Rahu had come to eat the sun. Indra rushed to Hanuman. Hanuman thought Indra to be another fruit and he turned towards him. Indra struck Hanuman with his thunderbolt, and Hanuman fell unconscious to earth. Seeing this Vayu became angry and interrupted life air of all living entities causing suffocation.

Indra and devatas pleaded to Vayu to release back the life air. Brahma also appeared there and Vayu explained that due to Indra’s thunderbolt, his son has fallen unconscious. Therefore he has withdrawn the life air.

Brahma brought Hanuman back to consciousness and informed the devatas, “This Vanara will accomplish your purpose on earth and become a famous servant of Vishnu. Please shower your blessings on him.”

Indra removed his garland and put it around Hanuman’s neck, saying, “From today my thunderbolt can never harm him.”

The sun-god blessed him with a hundredth part of his brilliance and unsurpassed knowledge of scriptures.

Yamaraja granted him invulnerability to his rod and freedom from ailment. Kuvera blessed him that he would fight untiringly in battle. Lord Shiva granted immunity from his weapons and that he could never be killed by him. Visvakarma added, “This Vanara shall be invulnerable to all celestial weapons created by me and he shall be long-lived.”

Finally, Brahma said, “O wind-god, your son shall be invincible in battle. He will be terror of his foes and the shelter of his friends. He can change his form at will and go wherever he pleases at any speed he likes. No Brahmin’s curse will be able to kill him. In war he will accomplish tremendous feats, thus causing Ravana's destruction and Rama's pleasure.”

After this the gods departed and Vayu took Hanuman back to his mother.

(As told to Lord Rama by Agastya Rishi in Valmiki Ramayana)

 

Posted On : 10 May 2018
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